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हेलीकॉप्टर से गोपालगंज और मोतिहारी में गंडक नदी की बाढ़ का जायजा लेते मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी

पटना/गोपालगंज/मोतिहारी: उत्तर बिहार के लोगों की नजर इन दिनों गंडक नदी पर टिकी है। नदी का पानी बढ़ रहा है और कई इलाकों में बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने खुद हालात परखने के लिए गोपालगंज और मोतिहारी का हवाई सर्वेक्षण किया। उन्होंने बाढ़ प्रभावित और संभावित प्रभावित क्षेत्रों में राहत, बचाव और जरूरी व्यवस्थाओं को लेकर प्रशासन को सतर्क और तत्पर रहने के निर्देश दिए।

हवाई सर्वेक्षण क्यों जरूरी होता है

बाढ़ जैसी स्थिति में फाइलों और रिपोर्टों से मिली जानकारी अक्सर घंटों पुरानी हो जाती है। आसमान से देखने पर एक नजर में साफ हो जाता है कि नदी किस दिशा में फैल रही है, कौन से गांव पानी के दायरे में आ सकते हैं और तटबंधों के किन हिस्सों पर दबाव है। यही वजह है कि आपदा के समय शीर्ष स्तर पर हवाई सर्वेक्षण को अहम माना जाता है। इससे नीचे के अधिकारियों को भी संदेश जाता है कि हालात पर सीधी नजर रखी जा रही है।

गोपालगंज और मोतिहारी का चुनाव भी इसी कारण अहम है। दोनों जिले गंडक के प्रभाव क्षेत्र में आते हैं और नदी का जलस्तर बढ़ने पर यहां के निचले गांवों, खेतों और सड़कों पर सबसे पहले असर पड़ता है।

गोपालगंज: खतरे के निशान से ऊपर पहुंचा पानी

गोपालगंज से आ रही स्थानीय रिपोर्टें बताती हैं कि जिले में गंडक खतरे के निशान से करीब 10 सेंटीमीटर ऊपर पहुंच गई थी। पांच प्रखंडों के 43 गांवों पर बाढ़ का खतरा बढ़ने की बात कही गई है। प्रशासन इन इलाकों की लगातार निगरानी कर रहा है।

ग्रामीणों को समझाया गया है कि पानी गांवों की ओर बढ़ने लगे तो वे देर न करें और तटबंधों या नजदीकी सरकारी भवनों जैसे सुरक्षित ठिकानों पर चले जाएं। अधिकारियों का तर्क सीधा है कि समय पर हटना, बाद में बचाव करने से कहीं ज्यादा आसान और सुरक्षित होता है।

मोतिहारी: तटबंध और निचले इलाकों पर नजर

पूर्वी चंपारण में भी नदी के दबाव और आसपास के निचले इलाकों की स्थिति पर नजर रखी जा रही है। सर्वेक्षण में शामिल क्षेत्रों में तटबंधों की सेहत, संवेदनशील बिंदुओं और बस्तियों की स्थिति को प्राथमिकता से देखा गया। मकसद यह पता लगाना था कि जरूरत पड़ने पर राहत सामग्री, नावें और बचाव दल किन जगहों पर सबसे पहले भेजने होंगे।

निर्देशों का सार

मुख्यमंत्री की ओर से प्रशासन को जो संदेश दिया गया, उसे तीन हिस्सों में समझा जा सकता है:

  • सतर्कता: नदी के जलस्तर और बैराज से छोड़े जा रहे पानी पर लगातार नजर रखी जाए।
  • तत्परता: राहत और बचाव का काम बिना देरी के शुरू हो सके, इसके लिए सारी तैयारी पहले से पूरी रहे।
  • व्यवस्था: प्रभावित लोगों के लिए जरूरी इंतजाम, जैसे सुरक्षित आश्रय, भोजन, पेयजल और चिकित्सा सुविधा, पहले से सुनिश्चित हों।

पिछले महीने की घटना से जुड़ी है चिंता

गंडक को लेकर मौजूदा सतर्कता की एक पृष्ठभूमि भी है। अगस्त में नेपाल में आई भीषण बाढ़ के बाद 27 अगस्त को मुख्यमंत्री ने सोनपुर से वाल्मीकिनगर तक गंडक का हवाई सर्वेक्षण किया था। उन्होंने वाल्मीकिनगर बैराज पहुंचकर उसके ऊपरी और निचले हिस्से में पानी के बहाव को देखा और नियंत्रण कक्ष का भी निरीक्षण किया था। उस समय जलस्राव करीब 1.06 लाख क्यूसेक था।

अधिकारियों के मुताबिक 26 अगस्त की रात करीब 11 बजे गंडक का पानी 1,50,200 क्यूसेक के शिखर पर पहुंचा था। तब गंडक से प्रभावित आठ जिलों में हाई अलर्ट जारी हुआ था और NDRF तथा SDRF की टीमें तैनात की गई थीं। इस बार गोपालगंज और मोतिहारी का सर्वेक्षण उसी निगरानी की अगली कड़ी माना जा सकता है।

गंडक की प्रकृति: नेपाल की बारिश का सीधा असर

गंडक नेपाल के हिमालयी इलाके से निकलकर वाल्मीकिनगर के रास्ते बिहार में दाखिल होती है और आगे कई जिलों से गुजरकर गंगा में मिलती है। ऊपरी इलाकों में तेज बारिश हो या अचानक बाढ़ आए, तो उसका असर बैराज पर पड़ता है और वहां से छोड़ा गया पानी जल्द ही बिहार के निचले हिस्सों तक पहुंचता है। इसीलिए बैराज का जलस्राव और नदी का स्तर रोजाना नहीं, बल्कि लगातार परखा जाता है।

लोगों के लिए जरूरी सावधानियां

प्रशासन की ओर से आम लोगों को कुछ बुनियादी सावधानियां बरतने की सलाह दी गई है:

  • सिर्फ आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करें और अफवाहें न फैलाएं।
  • जरूरी कागजात, दवाइयां, सूखा राशन और पीने का पानी सुरक्षित जगह पर रखें।
  • बच्चों, बुजुर्गों और मवेशियों को समय रहते ऊंचे स्थान पर पहुंचाने की योजना तैयार रखें।
  • बाढ़ के पानी में उतरने, नदी पार करने या तटबंध पर भीड़ लगाने से बचें।
  • प्रशासन के निर्देश मिलते ही बिना हिचक सुरक्षित स्थान पर चले जाएं।

बाढ़ के बाद की चुनौती भी बड़ी

बाढ़ का असर पानी उतरने के साथ खत्म नहीं होता। सड़कों का कटना, बिजली और पेयजल में रुकावट, फसलों की क्षति और जलजनित बीमारियों का खतरा बाद की बड़ी चुनौतियां होती हैं। इसलिए राहत के साथ स्वास्थ्य सेवाओं, साफ पानी और मवेशियों के चारे जैसी जरूरतों पर भी ध्यान देना पड़ता है। पानी घटने के बाद नुकसान के आकलन और पुनर्वास का काम भी समय से पूरा करना प्रशासन के लिए अहम होगा।

अब आगे क्या

फिलहाल असल परीक्षा आने वाले दिनों में होगी। अगर नेपाल या ऊपरी क्षेत्रों में बारिश बढ़ी, तो बैराज से छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा बदल सकती है और उसका सीधा असर गोपालगंज, मोतिहारी और आसपास के जिलों पर पड़ेगा। मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं कि वह नदी के हर उतार-चढ़ाव के साथ कितनी फुर्ती से कदम उठाता है और जरूरतमंदों तक मदद पहुंचाता है।

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