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नौकरी मांगने वाले से नौकरी देने वाले तक: बापू सभागार से सम्राट चौधरी ने खोला उद्यमिता का नया दरवाजा, हजारों खातों में पहुंची रकम और आई नई MSME नीति!

पटना: अगर किसी राज्य को बदलना हो, तो सबसे पहले वहां के लोगों की सोच बदलनी पड़ती है। बिहार में दशकों से युवाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल यही रहा है कि पढ़ाई के बाद नौकरी कहां मिलेगी। गुरुवार को पटना के बापू सभागार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इसी सवाल को पलटने की कोशिश की। उनका संदेश सीधा था: अब सवाल यह भी होना चाहिए कि मैं दूसरों को नौकरी कैसे दे सकता हूं। इसी सोच के साथ उन्होंने मुख्यमंत्री उद्यमी योजना के हजारों चयनित लाभुकों के खातों में किस्त की राशि भेजी, बिहार MSME नीति-2026 जारी की और एक करोड़ परिवारों को उद्यमी बनाने का संकल्प दोहराया।

सभागार के भीतर का माहौल

सुबह ग्यारह बजे शुरू हुए इस कार्यक्रम में बापू सभागार पूरी तरह भरा हुआ था। उद्योग विभाग ने इसे उन्मुखीकरण कार्यक्रम का नाम दिया था, यानी ऐसा आयोजन जिसमें चयनित लाभुकों को बताया जाए कि आगे क्या करना है। मंच पर मुख्यमंत्री मुख्य अतिथि थे और कार्यक्रम की अध्यक्षता उद्योग एवं खेल मंत्री श्रेयसी सिंह ने की।

सभागार में बैठे चेहरे अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए थे। कोई सिलाई की इकाई खोलने की योजना लेकर आया था, कोई खाद्य प्रसंस्करण में हाथ आजमाना चाहता था, तो किसी का इरादा गांव में फर्नीचर या घरेलू सामान बनाने की छोटी फैक्ट्री डालने का था। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी, जिन्होंने पहले कभी अपना कारोबार नहीं किया। उनके लिए यह सिर्फ सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी का रुख बदल देने वाला दिन था।

बटन दबा और खातों में पहुंची रकम

कार्यक्रम का केंद्रीय क्षण वह रहा, जब मुख्यमंत्री ने एक बटन दबाकर योजना के लाभुकों के बैंक खातों में किस्त की राशि अंतरित की। 7,000 से अधिक चयनित उद्यमियों को यह रकम सीधे उनके खातों में मिली। रिपोर्टों के अनुसार यह कुल राशि करीब 150 करोड़ रुपये रही और हर लाभुक को पहली किस्त के रूप में दो लाख रुपये दिए गए।

सीधे खाते में पैसा पहुंचने की व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि लाभुक और सरकार के बीच कोई तीसरा हाथ नहीं रहता। इससे न देरी की गुंजाइश बचती है और न कटौती की शिकायत की। योजना के तहत एक उद्यमी को कुल दस लाख रुपये तक की परियोजना राशि मिल सकती है, जिसे चरणों में जारी किया जाता है। पहली किस्त से इकाई की शुरुआती जरूरतें पूरी होती हैं, जबकि आगे की किस्तें काम की प्रगति के आधार पर मिलती हैं।

MSME नीति-2026: क्यों है यह अहम

कार्यक्रम का दूसरा बड़ा पड़ाव बिहार MSME नीति-2026 का लोकार्पण रहा। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम देश और राज्य, दोनों की अर्थव्यवस्था में रोजगार देने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र माने जाते हैं। बिहार जैसे राज्य में, जहां भारी उद्योगों की संख्या ऐतिहासिक रूप से कम रही है, यही क्षेत्र गांव-कस्बों में आर्थिक हलचल का असली जरिया बन सकता है।

नई नीति का मकसद इस क्षेत्र को स्पष्ट दिशा और भरोसा देना बताया गया है। यानी वह ढांचा, जिसमें कोई भी इच्छुक व्यक्ति कारोबार शुरू कर सके, उसे ऋण, प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच मिल सके और वह सरकारी प्रक्रियाओं की उलझन में फंसकर हिम्मत न हारे। नीति के लोकार्पण का संकेत यह भी है कि सरकार अब उद्यमिता को अलग-थलग योजनाओं की जगह एक सुसंगत नीतिगत ढांचे के तहत आगे बढ़ाना चाहती है।

मुख्यमंत्री ने मंच से जिस संकल्प को सबसे ज्यादा बल दिया, वह यही था कि बिहार के एक करोड़ परिवारों को उद्यमी परिवार बनाया जाए। रिपोर्टों के मुताबिक इसके लिए वर्ष 2030 तक की समय-सीमा रखी गई है। यह लक्ष्य आकार में बहुत बड़ा है, क्योंकि इसका अर्थ है राज्य के बहुत बड़े वर्ग को आर्थिक गतिविधि का सक्रिय भागीदार बनाना।

मुख्यमंत्री ने इसे समझाते हुए कहा कि एक उद्यमी का असर उसके अपने घर तक सीमित नहीं रहता। जब कोई व्यक्ति छोटी-सी इकाई लगाता है, तो वह दो-चार लोगों को काम देता है, स्थानीय दुकानों से सामान खरीदता है, ढुलाई कराता है और पैसे को गांव या कस्बे की अर्थव्यवस्था में घुमाता है। इस तरह एक इकाई कई घरों के चूल्हे जलाती है। यही कारण है कि सरकार हर परिवार से कम-से-कम एक व्यक्ति को उद्यम की राह पर लाना चाहती है।

बिहार से रोजगार के लिए बाहर जाने वालों की संख्या बहुत बड़ी रही है। दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण के राज्यों की फैक्ट्रियों, निर्माण स्थलों और दुकानों में बिहार के लोग बड़ी तादाद में काम करते हैं। मुख्यमंत्री ने इस कार्यक्रम में फिर कहा कि 2030 तक ऐसा बिहार बनाना सरकार का लक्ष्य है, जहां किसी को रोजगार के लिए राज्य छोड़ना न पड़े।

उद्यमी योजना इस लक्ष्य की सबसे सीधी कड़ी मानी जा रही है, क्योंकि यह लोगों को नौकरी के इंतजार में बैठाने के बजाय अपने गांव या शहर में ही कमाई का साधन खड़ा करने का मौका देती है। जब कमाई घर के पास होगी, तो परिवार भी साथ रहेगा और राज्य की कार्यशक्ति का लाभ राज्य को ही मिलेगा।

मुख्यमंत्री ने बाजार की उस चुनौती का भी जिक्र किया, जिससे हर नया उद्यमी जूझता है। पूंजी जुटाना एक बात है और बना हुआ माल बेचना दूसरी। उन्होंने बताया कि सरकार अपनी खरीद में बिहार में बने उत्पादों को प्राथमिकता देने की व्यवस्था पर काम कर रही है। इसके तहत राज्य की योजनाओं और विभागों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री का एक हिस्सा बिहार में निर्मित उत्पादों से लेना जरूरी बनाया जाएगा।

यह कदम कई मायनों में अहम है। सरकार खुद एक बहुत बड़ी खरीदार होती है, और अगर उसकी खरीद का एक हिस्सा स्थानीय इकाइयों के लिए सुरक्षित हो जाए, तो नए उद्यमियों को शुरुआती दिनों में ही एक भरोसेमंद ग्राहक मिल जाता है। इससे इकाइयां टिकने की संभावना बढ़ती है और ‘मेड इन बिहार’ की पहचान धीरे-धीरे मजबूत होती है।

मुख्यमंत्री उद्यमी योजना कोई नई शुरुआत नहीं है। पिछले कई वित्तीय वर्षों में भी इसके तहत लाभुक चुने गए और उन्हें किस्तें जारी हुईं। कई लाभुकों ने दस लाख रुपये की परियोजना राशि के सहारे फर्नीचर, अलमारी, बक्सा, सोफा और पलंग जैसे घरेलू उत्पाद बनाने की इकाइयां खड़ी कीं, जहां अनुभवी कारीगर काम करते हैं और माल स्थानीय बाजार में बिकता है। ऐसे उदाहरण नए चयनित लोगों के लिए प्रेरणा का काम करते हैं, क्योंकि वे दिखाते हैं कि सही योजना और मेहनत से यह रकम एक स्थायी कारोबार की नींव बन सकती है।

चयन की प्रक्रिया: कंप्यूटर की लॉटरी, पोर्टल पर निगरानी

योजना की एक खास बात इसकी चयन प्रक्रिया है। आवेदकों का चयन कंप्यूटर आधारित लॉटरी यानी रैंडमाइजेशन से होता है, जिसमें किसी की सिफारिश या पहुंच का कोई असर नहीं पड़ता। चुने गए आवेदकों को जरूरी दस्तावेज उद्यमी पोर्टल पर अपलोड करने होते हैं, और जो तय समय में ऐसा नहीं करते, उनकी उम्मीदवारी रद्द हो सकती है। पुराने लाभुकों से भी पोर्टल पर उपयोगिता प्रमाण-पत्र मांगा जाता है, ताकि पता रहे कि सरकारी पैसा सही जगह लगा है। इस तरह पूरी व्यवस्था डिजिटल निगरानी में चलती है।

कार्यक्रम को सिर्फ वितरण समारोह न बनाकर उन्मुखीकरण का रूप देने के पीछे एक व्यावहारिक कारण है। पहली बार कारोबार करने वाले व्यक्ति के सामने सैकड़ों सवाल होते हैं। इकाई कहां लगाएं, मशीन कहां से लें, कच्चा माल कैसे जुटाएं, हिसाब-किताब कैसे रखें, बैंक और विभाग से कैसे तालमेल बनाएं। अधिकारियों ने इसी जरूरत को देखते हुए लाभुकों को योजना की शर्तें, किस्तों के नियम और आगे की प्रक्रिया की जानकारी दी। जिला स्तर पर सहायता और संपर्क की व्यवस्था की बात भी बताई गई, ताकि किसी दिक्कत में लाभुक सीधे विभाग तक पहुंच सकें।

अध्यक्षता कर रहीं मंत्री श्रेयसी सिंह ने लाभुकों से आग्रह किया कि वे राशि का सही और समय पर उपयोग करें और अपनी इकाइयां जल्द शुरू करें। उन्होंने कहा कि सरकार अपना काम कर रही है, पर इकाई को सफल बनाने की असली जिम्मेदारी उद्यमी की अपनी लगन और अनुशासन की है। विभाग के अधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि हर पात्र लाभुक को तय प्रक्रिया के अनुसार समय पर किस्तें मिलती रहेंगी।

यह कार्यक्रम राज्य की उस बड़ी औद्योगिक तस्वीर का हिस्सा है, जो बीते कुछ महीनों में आकार ले रही है। बियाडा के जरिए अलग-अलग जिलों में नए औद्योगिक क्षेत्रों के लिए जमीन चिह्नित की गई है, कई निवेश प्रस्तावों को मंजूरी मिली है और बड़ी परियोजनाओं की घोषणाएं हुई हैं। बड़े उद्योग जहां बड़े निवेश और बड़े पैमाने का रोजगार लाते हैं, वहीं छोटे उद्यम गांव-गांव तक काम और आमदनी पहुंचाते हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि बड़े उद्योगों को भी आसपास के छोटे आपूर्तिकर्ताओं और सेवा देने वालों की जरूरत पड़ती है।

योजना के विभिन्न चरणों में समाज के अलग-अलग वर्गों, जैसे अनुसूचित जाति-जनजाति, अति पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिलाओं, की भागीदारी सुनिश्चित करने की कोशिश की जाती रही है। इसके पीछे सोच यह है कि उद्यमिता का मौका किसी एक तबके तक सिमटकर न रह जाए। महिलाओं के लिए यह योजना खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि अपनी आमदनी का साधन खड़ा करना उन्हें आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह से मजबूत बनाता है।

लक्ष्य बड़ा है, तो चुनौतियां भी बड़ी

एक करोड़ परिवारों को उद्यमी बनाने का लक्ष्य जितना प्रेरक है, उतना ही कठिन भी। सिर्फ पूंजी देने से उद्यम नहीं टिकते। उन्हें प्रशिक्षण, कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति, भरोसेमंद बिजली और सड़क, बाजार से जुड़ाव और समय पर भुगतान जैसी सुविधाएं भी चाहिए। देखा गया है कि कई छोटे कारोबार शुरुआती दो-तीन साल में ही बंद हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें टिकने का सहारा नहीं मिलता। इसलिए सरकार के सामने असली परीक्षा यह होगी कि वह इकाइयां शुरू कराने के साथ उन्हें चलाए रखने का माहौल भी बनाए।

जानकारों का कहना है कि MSME नीति-2026 की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि बैंकों से ऋण आसानी से मिले, विभागों से मंजूरी में देरी न हो और सरकारी खरीद में स्थानीय उत्पादों को सचमुच प्राथमिकता मिले। इन्हीं बातों पर आने वाले महीनों में नजर रहेगी।

अगर लक्ष्य का अच्छा-खासा हिस्सा भी हासिल हो गया, तो इसका असर दूर तक जाएगा। नई इकाइयों से स्थानीय रोजगार बढ़ेगा, लोगों की आय में इजाफा होगा और बाजार में मांग बढ़ेगी। इससे राज्य का राजस्व भी बढ़ेगा और विकास कार्यों के लिए संसाधन जुटाना आसान होगा। पलायन घटने से गांवों में परिवारों और युवाओं की मौजूदगी बनी रहेगी, जिसका सामाजिक असर भी सकारात्मक होगा।

लौटते लाभुकों की बातें

कार्यक्रम खत्म होने के बाद सभागार से निकलते लाभुकों में उत्साह साफ दिख रहा था। कई लोगों ने कहा कि अब तक उन्हें लगता था कि अपना काम शुरू करना सिर्फ बड़े लोगों के बस की बात है। कुछ ने बताया कि वे दूसरे शहरों में नौकरी या मजदूरी कर रहे थे और अब अपने गांव लौटकर अपनी इकाई खड़ी करने की तैयारी में हैं। उनका कहना था कि यह मदद उनके लिए जीवन बदलने वाला मौका है, बशर्ते आगे भी सहयोग मिलता रहे।

अब देखना यह है कि 7,000 से अधिक नई इकाइयों में से कितनी तय समय में शुरू होकर उत्पादन तक पहुंचती हैं और MSME नीति-2026 के प्रावधान जमीन पर कितनी तेजी से उतरते हैं। साथ ही यह भी देखना होगा कि 2030 तक एक करोड़ परिवारों के लक्ष्य की ओर सरकार किस चरणबद्ध योजना और संसाधन के साथ आगे बढ़ती है।

बापू सभागार का यह कार्यक्रम इतना तो साफ कर गया कि राज्य सरकार उद्यमिता को अपनी आर्थिक रणनीति के केंद्र में रखकर चलना चाहती है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के शब्दों में यह सिर्फ योजना नहीं, बल्कि बिहार को आत्मनिर्भर और समृद्ध बनाने का संकल्प है। इस संकल्प की असली कसौटी आने वाले वर्षों में यही होगी कि कागज पर लिखा लक्ष्य लाखों घरों की हकीकत कितना बन पाता है।

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