पटना: कुछ बैठकें सिर्फ रणनीति के लिए होती हैं, और कुछ बैठकें अपने आप में एक इम्तिहान बन जाती हैं। कल पटना में लोक सेवक आवास पर होने वाली NDA की बैठक दूसरी श्रेणी में गिनी जा रही है। बैठक की अध्यक्षता मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी करेंगे, पूरे गठबंधन के सांसद, विधायक और विधान पार्षद बुलाए गए हैं, और चुनाव में बस कुछ ही दिन बाकी हैं। सतह पर यह विधान परिषद की आठ सीटों की रणनीति का मामला है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में असली चर्चा उस एक सवाल की है जिसका जवाब अब तक किसी ने खुलकर नहीं दिया।
विधान परिषद में सत्ता पक्ष के मुख्य सचेतक संजय गांधी के मुताबिक, बैठक में सभी विधायकों, विधान पार्षदों और सांसदों को पहुंचने का निर्देश दिया गया है। उन्होंने बताया कि आज शाम से कल सुबह तक सभी राजधानी पहुंच जाएंगे। यानी जिले-जिले से जनप्रतिनिधियों का काफिला पटना की तरफ बढ़ रहा है।
इतने बड़े पैमाने पर बुलावा कम ही देखने को मिलता है। शिक्षक और स्नातक सीटों के चुनाव में मतदाता आम जनता नहीं, बल्कि पंजीकृत शिक्षक और स्नातक होते हैं। फिर भी अगर गठबंधन अपने हर सांसद और विधायक को एक मंच पर बुला रहा है, तो इसका मतलब है कि वह कोई भी जोखिम नहीं लेना चाहता। हर जनप्रतिनिधि को अपने इलाके के मतदाताओं तक पहुंचने की जिम्मेदारी निभानी पड़ सकती है।
घड़ी की सुई और नाम वापसी का दबाव
बैठक का समय भी सोच-समझकर चुना गया माना जा रहा है। बिहार विधान परिषद की आठ सीटों पर मतदान 23 अक्टूबर को होना है और नामांकन वापसी की अंतिम तारीख 9 अक्टूबर है। यानी जो भी नाराज दावेदार या बागी उम्मीदवार मैदान में हैं, उन्हें मनाने का मौका बस इन्हीं कुछ घंटों में है। उसके बाद चुनावी तस्वीर साफ हो जाएगी और जो उम्मीदवार डटे रहेंगे, वे सीधे गठबंधन के उम्मीदवारों की राह में चुनौती बनकर खड़े होंगे।
मतगणना 27 अक्टूबर को होनी है, लेकिन असली लड़ाई उससे बहुत पहले, नाम वापसी की इसी खिड़की में लड़ी जा रही है। इसीलिए इस बैठक को डैमेज कंट्रोल की आखिरी बड़ी कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
बैठक से पहले सबसे ज्यादा चर्चा पटना स्नातक सीट की है। यहां जदयू ने नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाया है, लेकिन मोकामा के विधायक अनंत सिंह के तेवर पार्टी के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, वे नीरज कुमार का लगातार विरोध कर रहे हैं और विपक्षी खेमे के एक उम्मीदवार के पक्ष में सक्रिय बताए जा रहे हैं। मामला इतना गरमाया कि जदयू के भीतर शीर्ष स्तर पर बातचीत शुरू हो गई।
बताया जाता है कि केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने अनंत सिंह से फोन पर बात की, और नीतीश कुमार भी इस मामले में सक्रिय दिखे। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने ललन सिंह के साथ बंद कमरे में करीब 20 मिनट तक चर्चा की। इन कोशिशों का नतीजा क्या निकला, यह अब तक सार्वजनिक नहीं है।
जब मुख्य सचेतक संजय गांधी से पूछा गया कि क्या अनंत सिंह को भी बैठक में बुलाया जाएगा, तो उन्होंने इस सवाल पर कुछ नहीं कहा। उन्होंने सिर्फ इतना दोहराया कि बैठक में NDA के तमाम दिग्गज नेताओं को बुलाया गया है। इस चुप्पी ने चर्चा को और हवा दे दी है। सवाल सीधा है: अनंत सिंह बैठक में दिखेंगे या नहीं, और अगर दिखे तो क्या उनके तेवर नरम होंगे?
इस पूरे घटनाक्रम में केंद्रीय मंत्री ललन सिंह की भूमिका पर भी नजरें टिकी हैं। उन्हें ही इस विवाद को सुलझाने की जिम्मेदारी दी गई बताई जाती है। अगर बैठक में दोनों नेता आमने-सामने आते हैं, तो उसका संदेश सिर्फ पटना स्नातक सीट तक सीमित नहीं रहेगा। यह पूरे गठबंधन के लिए संकेत होगा कि अंदरूनी मतभेद कितने गहरे हैं या कितनी जल्दी सुलझ सकते हैं।
चार-चार सीटों का बंटवारा, दोनों दलों की साख दांव पर
NDA ने आठों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं, जिनमें भाजपा और जदयू के चार-चार प्रत्याशी हैं। भाजपा की सूची में पटना शिक्षक से नवल किशोर यादव, कोसी स्नातक से डॉ. एन.के. यादव, दरभंगा स्नातक से सर्वेश कुमार और तिरहुत शिक्षक से नरेंद्र प्रसाद सिंह के नाम हैं। जदयू की ओर से पटना स्नातक पर नीरज कुमार और तिरहुत स्नातक पर अभिषेक झा समेत चार उम्मीदवार हैं।
इस बराबर के बंटवारे का एक सीधा मतलब यह है कि किसी एक सीट पर भी चूक पूरे गठबंधन के आठ में आठ सीटें जीतने के दावे को कमजोर कर सकती है। यही वजह है कि दोनों दल अपनी-अपनी सीटों पर पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में हैं।
बागी तेवर सिर्फ एक दल या एक सीट की कहानी नहीं है। चर्चा है कि भाजपा के भीतर भी कुछ असंतुष्ट नेता चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी में थे, जिसके बाद पार्टी नेतृत्व ने अपने उम्मीदवारों के साथ अलग से बैठक कर संगठन को दुरुस्त करने की कोशिश की। विपक्षी महागठबंधन में भी कुछ सीटों पर आपसी खींचतान की खबरें हैं, खासकर दरभंगा शिक्षक सीट को लेकर।
यानी दोनों खेमे अपने-अपने घर की दरारें भरने में जुटे हैं। जो गठबंधन नाम वापसी से पहले अपने असंतुष्टों को बेहतर ढंग से संभाल लेगा, उसे चुनावी मैदान में बढ़त मिलना तय माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए यह बैठक एक तरह से नेतृत्व की कसौटी भी है। गठबंधन में पांच दल हैं और हर दल की अपनी अपेक्षाएं हैं। सबको एक मंच पर लाना, नाराजगी को शांत करना और साझा लक्ष्य के लिए सबको राजी करना आसान काम नहीं। इसी साल मार्च में राज्यसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने अपने आवास पर NDA के सभी विधायकों को जुटाकर गठबंधन को एकजुट रखने की कवायद की थी। अब वही अनुभव उनके काम आ सकता है, लेकिन इस बार चुनौती थोड़ी अलग है, क्योंकि असंतोष गठबंधन के भीतर से उठ रहा है।
संभावित एजेंडा: बैठक में क्या हो सकता है
बैठक से जुड़े संकेतों के आधार पर चर्चा के कुछ मुख्य मुद्दे इस तरह हो सकते हैं।
पहला, हर सीट के लिए अलग रणनीति, क्योंकि पटना, दरभंगा, तिरहुत और कोसी जैसे क्षेत्रों का सामाजिक और शैक्षणिक गणित एक-दूसरे से अलग है।
दूसरा, घटक दलों के बीच समन्वय, ताकि भाजपा, जदयू, लोजपा (रामविलास), रालोमो और हम के कार्यकर्ता मिलकर काम करें।
तीसरा, बागियों को मनाने की रणनीति और नाम वापसी से पहले संभावित बातचीत।
चौथा, मतदाता संपर्क और वोट मैनेजमेंट, यानी पंजीकृत शिक्षकों और स्नातकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने की योजना।
पांचवां, जनप्रतिनिधियों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा।
इन चुनावों में मतदाताओं की संख्या कम होती है, लेकिन वे जागरूक और संगठित माने जाते हैं। इसलिए एक-एक वोट मायने रखता है और थोड़ा-सा अंतर भी नतीजा पलट सकता है। जब किसी सीट पर बागी या निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में होते हैं, तो वोट बंटते हैं और इसका सीधा असर नतीजे पर पड़ता है। यही कारण है कि गठबंधन नेतृत्व किसी भी असंतुष्ट को हल्के में नहीं ले रहा।
विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत के बाद यह NDA के लिए पहली बड़ी चुनावी परीक्षा मानी जा रही है। ये नतीजे सिर्फ विधान परिषद में संख्या बल तय नहीं करेंगे, बल्कि यह भी बताएंगे कि गठबंधन के भीतर समन्वय कितना मजबूत है और शिक्षित मतदाता वर्ग में उसकी पकड़ कितनी गहरी है।
अब देखना यह है कि कल की बैठक में कौन-कौन से चेहरे दिखते हैं और कौन गैरहाजिर रहता है। बैठक के बाद नाम वापसी की समय-सीमा तक क्या बागी उम्मीदवार मैदान से हटते हैं, या मुकाबला त्रिकोणीय बन जाता है, यह भी जल्द साफ हो जाएगा। मुख्य सचेतक संजय गांधी ने भरोसा जताया है कि गठबंधन सभी आठ सीटें जीतेगा, लेकिन यह दावा कितना टिकता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि लोक सेवक आवास से निकलने वाला संदेश एकजुटता का होगा या दरार का।
फिलहाल पूरे बिहार की राजनीति की नजर एक ही दरवाजे पर टिकी है, और इंतजार इस बात का है कि कल उस दरवाजे के भीतर क्या होता है।













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