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अमेरिका का बड़ा झटका: माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी और 6 IT कंपनियां ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड, इंफोसिस-विप्रो-HCL-टाटा पर भी गिरी गाज, भारतीय पेशेवरों की बढ़ी बेचैनी

वॉशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिका में काम कर रहे विदेशी टेक पेशेवरों के लिए गुरुवार की शाम एक बड़ी खबर लेकर आई। अमेरिकी श्रम विभाग ने घोषणा की कि वह दुनिया की दो दिग्गज टेक कंपनियों, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी, को स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम से निलंबित कर रहा है। यही कार्यक्रम विदेशी कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड यानी स्थायी निवास की राह का एक जरूरी चरण है। रोक सिर्फ इन दो कंपनियों तक सीमित नहीं रही। छह बड़ी IT आउटसोर्सिंग कंपनियों, यानी कॉग्निजेंट, इंफोसिस, कैपजेमिनी, टाटा, विप्रो और HCL, पर भी यही कार्रवाई लागू की गई है।

किसने की घोषणा और क्या कहा गया

घोषणा अमेरिका के श्रम मंत्री कीथ सोंडरलिंग ने की। उनके मुताबिक विभाग इन कंपनियों के नए स्थायी श्रम प्रमाणन आवेदन स्वीकार नहीं करेगा और जो आवेदन पहले से लंबित हैं, उन पर भी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाएगा। माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी के मामले में उन्होंने कारण बताया कि इन दोनों के खिलाफ कई संघीय जांचें चल रही हैं। छह IT सेवा कंपनियों पर रोक के पीछे की दलील उन्होंने अलग से रखी, जो मुख्य रूप से विदेशी कामगारों के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से जुड़ी है।

सोंडरलिंग ने आंकड़े भी रखे। उनके अनुसार 2009 से अब तक इन कंपनियों ने मिलकर करीब 30 लाख विदेशी कामगारों के लिए अर्जियां दी हैं। इनके खाते में 2.3 लाख से ज्यादा H-1B वीजा मंजूरियां और एक लाख से अधिक स्थायी श्रम प्रमाणन दर्ज हैं। मंत्री ने इसे ऐसे रोजगारों के रूप में पेश किया, जो उनके शब्दों में अमेरिकी कामगारों के हाथ से निकल गए। यह दावा सरकार का है और कंपनियां इससे सहमत नहीं हैं।

उपराष्ट्रपति वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट को बनाया निशाना

इसी कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने खासतौर पर माइक्रोसॉफ्ट का नाम लिया। उन्होंने कहा कि कंपनी ने 2025 में लगभग 6,000 कर्मचारियों की छंटनी की, जबकि उसी दौरान उसे करीब 6,300 H-1B मंजूरियां और लगभग 3,000 ग्रीन कार्ड के रास्ते मिले। उनका संदेश सीधा था कि कंपनी को अमेरिकी कामगारों को नौकरी देनी चाहिए। वेंस की दलील यह रही कि कुछ कंपनियां इन कार्यक्रमों का इस्तेमाल अमेरिकी कर्मचारियों की जगह सस्ते विदेशी श्रम को लाने में करती हैं।

माइक्रोसॉफ्ट का पक्ष

माइक्रोसॉफ्ट ने इन आरोपों को खारिज किया है। कंपनी का कहना है कि उसकी भर्ती प्रक्रिया अमेरिकी कामगारों को नुकसान नहीं पहुंचाती। कंपनी की ओर से यह भी बताया गया कि पिछले वित्त वर्ष में उसने करीब 6,000 H-1B आवेदन दिए, जिनमें से लगभग 80 प्रतिशत मौजूदा कर्मचारियों की वीजा अवधि बढ़ाने या उनकी स्थिति बदलने के लिए थे। यानी इनमें से ज्यादातर नए विदेशी कर्मचारियों को बुलाने की बजाय पहले से कंपनी में कार्यरत लोगों से जुड़े थे। एडोबी की ओर से इस खबर के आने तक कोई टिप्पणी नहीं मिली थी।

इस घोषणा का समय सुर्खियों में रहा। बताया गया कि यह ऐलान उसी शिखर सम्मेलन में किया गया, जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्य नडेला और अन्य प्रमुख टेक प्रमुखों को राष्ट्रीय विज्ञान पदक देना था। यानी एक ही मंच से एक तरफ तकनीकी योगदान का सम्मान और दूसरी तरफ उसी उद्योग के दिग्गजों पर कड़ी कार्रवाई की घोषणा, दोनों सामने आईं। बाजार ने भी इस खबर पर प्रतिक्रिया दी और गुरुवार को माइक्रोसॉफ्ट के शेयर करीब 1.7 प्रतिशत गिरते दिखे।

PERM क्या है और यह इतना अहम क्यों

आम पाठकों के लिए यह समझना जरूरी है कि स्थायी श्रम प्रमाणन, जिसे PERM कहा जाता है, असल में क्या है। अमेरिका में ज्यादातर रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के लिए नियोक्ता को पहले श्रम विभाग से यह प्रमाणित कराना पड़ता है कि उस पद के लिए कोई योग्य और इच्छुक अमेरिकी कामगार उपलब्ध नहीं है और विदेशी कर्मचारी को रखने से अमेरिकी कामगारों की मजदूरी या अवसरों पर बुरा असर नहीं पड़ेगा। इसके लिए कंपनी को पहले भर्ती का विज्ञापन देकर बाजार को परखना पड़ता है। जब कोई योग्य अमेरिकी आवेदक नहीं मिलता, तभी कंपनी प्रमाणन के लिए आवेदन करती है।

यह प्रमाणन ग्रीन कार्ड की याचिका दाखिल करने से पहले का अनिवार्य कदम है। इसलिए जब किसी कंपनी का PERM आवेदन ही रोक दिया जाए, तो उसके कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड का सफर पहले ही पड़ाव पर अटक जाता है।

किन पर पड़ेगा सीधा असर

रिपोर्टों के अनुसार, यह रोक उन विदेशी कर्मचारियों को तुरंत अमेरिका से बाहर नहीं करती जो पहले से वहां काम कर रहे हैं। उनकी मौजूदा वीजा स्थिति फिलहाल बनी रहती है। लेकिन जिन कर्मचारियों के नियोक्ताओं ने ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया शुरू की थी या शुरू करने की तैयारी में थे, उनके सामने अनिश्चितता खड़ी हो गई है। प्रभावित कंपनियों के जरिए अब उन्हें PERM का रास्ता नहीं मिलेगा, और जब तक रोक हटती नहीं, उनका स्थायी निवास का सपना ठहर सकता है।

जिन लोगों के आवेदन पहले से लंबित हैं, उनके लिए भी स्थिति साफ नहीं है, क्योंकि श्रम विभाग ने कहा है कि वह लंबित मामलों पर भी कार्रवाई नहीं करेगा। यह ऐसे कर्मचारियों के लिए खास तौर पर चिंता की बात है, जिन्होंने वर्षों इंतजार किया है।

भारत के लिहाज से क्यों अहम

भारतीय पाठकों के लिए यह खबर सिर्फ दूर की अंतरराष्ट्रीय खबर नहीं है। जिन छह IT सेवा कंपनियों पर रोक लगी है, उनमें इंफोसिस, टाटा, विप्रो और HCL जैसे भारतीय मूल के बड़े नाम शामिल हैं। कॉग्निजेंट का भी भारत में बड़ा कार्यबल है। अमेरिका में H-1B और रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड पाने वालों में बड़ी संख्या भारतीय पेशेवरों की मानी जाती है, इसलिए किसी भी सख्ती का असर भारतीय परिवारों और करियर योजनाओं पर सीधे पड़ता है। माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी जैसी कंपनियों में भी बड़ी संख्या में भारतीय मूल के इंजीनियर और प्रबंधक काम करते हैं, जो ग्रीन कार्ड की कतार में हो सकते हैं।

हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि इस फैसले का असर कितने भारतीय कर्मचारियों पर कितनी गंभीरता से पड़ेगा, क्योंकि इसकी विस्तृत गाइडलाइन और आंकड़े अभी सामने नहीं आए हैं।

यह कार्रवाई अचानक नहीं हुई है। रिपोर्टों के मुताबिक, पिछले वर्ष जुलाई में श्रम विभाग ने H-1B और PERM कार्यक्रमों में धोखाधड़ी और मानव तस्करी की आशंकाओं की जांच के लिए देशव्यापी अभियान शुरू किया था। माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी पर रोक का आधार उन्हीं चल रही संघीय जांचों को बताया गया है। हालांकि जांचों के ब्योरे, यानी किन आरोपों पर और किस स्तर तक जांच हो रही है, सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किए गए। इसलिए इन कंपनियों पर लगे आरोप अभी जांच के स्तर पर हैं और किसी अदालत में सिद्ध नहीं हुए हैं।

विश्लेषकों के मुताबिक, यह कदम ट्रंप प्रशासन की उस व्यापक नीति से जुड़ा है, जिसमें आव्रजन और विदेशी कर्मचारियों की भर्ती से जुड़े कार्यक्रमों पर सख्ती बढ़ाई जा रही है। नवंबर में अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने हैं, और ऐसे समय में ‘अमेरिकी कामगारों को प्राथमिकता’ का संदेश राजनीतिक रूप से अहम माना जाता है। प्रशासन का तर्क है कि वह घरेलू रोजगार की रक्षा कर रहा है, जबकि आलोचक इसे उद्योग पर दबाव बनाने और विदेशी प्रतिभा के लिए रास्ते संकरे करने वाला कदम बता सकते हैं।

टेक उद्योग में इस फैसले को लेकर चिंता स्वाभाविक है। कई कंपनियां तर्क देती रही हैं कि कुछ विशेष तकनीकी भूमिकाओं के लिए अमेरिका में पर्याप्त प्रशिक्षित लोग उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए वैश्विक प्रतिभा तक पहुंच जरूरी है। वहीं सरकार और उसके समर्थकों की दलील है कि इन कार्यक्रमों का दुरुपयोग हुआ है और कंपनियों ने छंटनी करते हुए भी विदेशी कर्मचारियों के लिए आवेदन जारी रखे। सोशल मीडिया पर भी इस पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं दिखीं। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि अगर कंपनियों पर कार्रवाई हो रही है, तो इसका खामियाजा उन कर्मचारियों को क्यों भुगतना पड़े, जो ग्रीन कार्ड के जरिए कंपनी की निर्भरता से मुक्त होना चाहते थे।

विशेषज्ञ आमतौर पर ऐसे हालात में प्रभावित कर्मचारियों को कुछ व्यावहारिक सलाह देते हैं। पहली बात, अपने नियोक्ता और आव्रजन वकील से सीधे संपर्क करके अपनी स्थिति की जानकारी लें, क्योंकि हर मामला अलग होता है। दूसरी, अपने सभी दस्तावेज, आवेदन की रसीदें और पुराने पत्राचार सुरक्षित रखें। तीसरी, अफवाहों पर भरोसा करने की बजाय श्रम विभाग और आधिकारिक सूचनाओं का इंतजार करें। इसके अलावा यह भी देखना होगा कि रोक कितने समय के लिए है और क्या इसे अदालत में चुनौती दी जाती है। ये सामान्य जानकारी है, किसी के निजी मामले में कानूनी सलाह का विकल्प नहीं।

अब सबकी नजर इस पर रहेगी कि प्रभावित कंपनियां इस फैसले का जवाब कैसे देती हैं। माइक्रोसॉफ्ट पहले ही अपना पक्ष रख चुकी है। संभव है कि कंपनियां कानूनी रास्ता अपनाएं या प्रशासन से बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश करें। यह भी देखना होगा कि जांचों में आगे क्या निकलता है और क्या रोक का दायरा बढ़ाकर दूसरी कंपनियों तक पहुंचाया जाता है। भारत सरकार और भारतीय IT उद्योग संगठनों की प्रतिक्रिया भी आने वाले दिनों में अहम रहेगी।

फिलहाल इतना साफ है कि यह फैसला अमेरिका की आव्रजन नीति में एक कड़ा मोड़ दिखाता है। एक तरफ घरेलू रोजगार की रक्षा का दावा है, दूसरी तरफ हजारों विदेशी पेशेवरों के भविष्य पर सवालिया निशान। इस कहानी का अगला अध्याय जांचों के नतीजों, कंपनियों के जवाब और अदालतों के रुख से तय होगा।

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